नालंदा में उत्पाद विभाग के सिपाही अजीत कुमार की हत्या को पहले शराब तस्करों की फायरिंग का नतीजा बताया गया। लेकिन, पुलिस की जांच में कहानी पलट गई। अबतक सामने आए तथ्यों के मुताबिक, अजीत की जान टीम में शामिल होमगार्ड जवान की राइफल से चली गोली से गई। मामले में महिला दारोगा पुष्पा कुमारी समेत सात लोगों की गिरफ्तारी की खबर है। जांच में कथित तौर पर घटना की असलियत छिपाने और साक्ष्य दबाने के प्रयास के आरोप भी सामने आए हैं। सवाल यह है कि आखिर उस रात हुआ क्या था?
शराब लदी पिकअप वन का पीछा करना क्या वास्तव में इस कार्रवाई का एकमात्र उद्देश्य था? यदि ऐसा था, तो चलती गाड़ी को रोकने के लिए फायरिंग की नौबत क्यों आई? क्या कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के तहत की गई थी? वरिष्ठ अधिकारियों और स्थानीय थाने को समय पर सूचना क्यों नहीं दी गई? जिस वाहन में अजीत सवार थे, उसे तत्काल पुलिस के हवाले करने के बजाय पटना क्यों ले जाया गया?
वाहन पर पीछे की ओर गोली लगने के निशान और शुरुआती बयानों में विरोधाभास ने जांच को गंभीर बना दिया है। गोली के प्रवेश और निकास का रास्ता, अजीत के सिर में लगी चोट तथा घटनास्थल पर वाहनों की स्थिति का फॉरेंसिक परीक्षण इन सवालों के जवाब दे सकता है। केवल शुरुआती बयानों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
अजीत और महिला दारोगा के बीच कथित निजी संबंधों की चर्चा भी सामने आई है। लेकिन, पुलिस ने अबतक इसकी पुष्टि नहीं की है। ऐसे में क्या व्यक्तिगत विवाद की कोई भूमिका थी, या फायरिंग के पीछे केवल संदिग्ध वाहन को रोकने की कोशिश? शराब तस्करों से उगाही और सरकारी गोली के दुरुपयोग की आशंका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: क्या अजीत की मौत महज कार्रवाई के दौरान हुई दुर्घटना थी, या उसके बाद सच्चाई छिपाने की कोशिश ने मामले को और गंभीर बना दिया? हथियार की बैलिस्टिक जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल के साक्ष्य, कॉल रिकॉर्ड और सभी आरोपितों के बयानों का मिलान ही सच सामने ला सकता है।


