किसी आपराधिक मामले में सच बोलकर गवाही देना क्या इतना बड़ा अपराध है कि उसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़े? सारण के अवतारनगर थाना क्षेत्र के रामपुर प्रतापपुर की घटना ने यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। केस में गवाही देने से नाराज लोगों पर 48 वर्षीय मजदूर शंभुशरण साह को अगवा कर घर में बंद करने और मारपीट करने का आरोप है। गंभीर रूप से घायल शंभुशरण की पांच अक्टूबर की रात पटना के रूबन अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।
परिवार का आरोप है कि एक अक्टूबर को मजदूरी करने गए शंभुशरण को तीन लोग जबरन अपने साथ ले गए। उन्हें एक आरोपित के घर में बंद कर दो लाख रुपये मांगे गए। रुपये नहीं देने पर मारपीट की गई। स्वजन के पहुंचने पर उन पर फिर हमला किया गया। गंभीर हालत में पहले दिघवारा और फिर पीएमसीएच से उन्हें रूबन अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई।
धमकियां पहले मिलीं तो पुलिस ने क्या किया?
मृतक की पत्नी सुषमा देवी ने आरोप लगाया है कि उनके पति ने अवतारनगर थाना कांड संख्या 367/24 में आरोपित मुकेश कुमार सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। उनका यह भी दावा है कि मुकेश, पिंटू और दिलेश पहले उनके घर आकर धमकी दे चुके थे। डर के कारण उस समय पुलिस को सूचना नहीं दी गई।
यहीं पुलिस की कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि किसी गवाह को पहले से धमकियां मिल रही थीं तो क्या पुलिस तक इसकी जानकारी पहुंची थी? यदि जानकारी मिली थी तो खतरे का आकलन किया गया या नहीं? और यदि परिवार ने डर के कारण शिकायत नहीं की, तो क्या संवेदनशील मामलों में पुलिस ने स्वत: गवाह की सुरक्षा का आकलन किया?
इन सवालों का जवाब जांच में सामने आना जरूरी है। क्योंकि अब मामला केवल एक मजदूर पर हमले का नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी सामने है कि क्या एक गवाह को समय रहते सुरक्षा मिल जाती तो उसकी जान बच सकती थी?
गवाह की सुरक्षा केवल कागज पर नहीं
गवाहों की सुरक्षा के लिए देश में Witness Protection Scheme, 2018 लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने Mahender Chawla बनाम Union of India मामले में इस योजना को लागू और बाध्यकारी बनाया था। योजना का उद्देश्य गवाहों को धमकी, डराने-धमकाने और नुकसान से बचाना है।
योजना के तहत खतरे के आकलन के आधार पर पुलिस सुरक्षा, अदालत तक सुरक्षित पहुंच, पहचान गोपनीय रखना, सुरक्षित स्थान पर अस्थायी आवास और गंभीर परिस्थितियों में स्थानांतरण जैसे उपाय किए जा सकते हैं। प्रत्येक जिले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अध्यक्षता में सक्षम प्राधिकरण की व्यवस्था भी की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि गवाहों को बिना भय के बयान देने में सक्षम बनाना निष्पक्ष सुनवाई और न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने राज्यों को Witness Protection Scheme को सख्ती से लागू करने का निर्देश भी दिया है।
अब जांच की कसौटी पर पुलिस
शंभुशरण की मौत के बाद पुलिस के सामने चुनौती सिर्फ आरोपितों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मृतक को पहले कभी धमकी मिली थी या नहीं, इसकी सूचना पुलिस तक पहुंची थी या नहीं, गवाह की सुरक्षा को लेकर कोई आकलन हुआ था या नहीं और घटना से पहले आरोपितों की गतिविधियों की कोई शिकायत दर्ज हुई थी या नहीं।
गवाह अगर अदालत में सच बोलने के बाद अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है तो न्याय व्यवस्था में उसका भरोसा कैसे कायम रहेगा? इस मामले में पुलिस की कार्रवाई जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह पता लगाना भी है कि गवाही देने वाले व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किस स्तर पर छूटी।
अब जानलेवा हमले का मामला हत्या में बदल चुका है। ऐसे में जांच केवल घटना के बाद की कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि घटना से पहले की धमकियों और संभावित सुरक्षा चूक की भी पड़ताल होनी चाहिए।


