दिल्ली में CJP प्रोटेस्ट के ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कुछ तस्वीरें देश की राजधानी में बेटियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। दावा किया जा रहा है कि तस्वीरों में कुछ लोगों का महिलाओं के साथ व्यवहार आपत्तिजनक है। सवाल यह है कि जब प्रोटेस्ट को रोकने के लिए विभिन्न सुरक्षा बलों के लगभग 40 हजार जवान सड़क पर तैनात थे, तब ऐसी घटनाओं से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
वायरल तस्वीरों में कथित तौर पर शामिल कुछ लोगों के गले में भगवा गमछा दिखाई देने की बात कही जा रही है। इसी आधार पर उन्हें सत्तापोषित गुंडा बताए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। CJP के सौरव दास ने आरोप लगाया है कि संबंधित लोगों को दिल्ली पुलिस का संरक्षण प्राप्त था। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी जरूरी है। केवल भगवा गमछा पहनने के आधार पर किसी व्यक्ति को किसी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़ा मान लेना भी उचित नहीं होगा।
भाजपा नेतृत्व के सामने भी परीक्षा
यह भी संभव है कि कुछ अराजक तत्व भाजपा और RSS की छवि बिगाड़ने की मंशा से ऐसी गतिविधियों में शामिल हों। यदि ऐसा है, तो इसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करानी चाहिए और दोषियों की पहचान होने पर उनके नाम सार्वजनिक करने की मांग करनी चाहिए।
दिल्ली पुलिस अपनी साख कैसे बचाएगी?
दिल्ली पुलिस को भी आरोपों को गंभीरता से लेते हुए वायरल तस्वीरों और संबंधित घटनाक्रम की जांच करनी चाहिए। यदि किसी ने कानून तोड़ा है या किसी को संरक्षण दिया गया है, तो साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। दोषियों की गिरफ्तारी और तथ्यों का सार्वजनिक खुलासा ही पुलिस की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों का जवाब दे सकता है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और महिलाओं की सुरक्षा दोनों महत्वपूर्ण हैं। किसी भी पक्ष को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। हालांकि, वायरल तस्वीरों की सत्यता की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।


