दिल्ली विवि छात्र संघ चुनाव परिणाम-2026 के रूप में राष्ट्रीय राजधानी से युवाओं की तरफ से जो संदेश आया है वह 'येन केन प्रकरेण' अपने पक्ष को सत्ता में काबिज करने और अपना करियर बनाने में जुटे नेताओं और 'सामाजिक कार्यकर्ताओं' के लिए एक बुरे सपने जैसा है। 18 सितंबर को आए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव परिणामों में एबीवीपी को चार प्रमुख पदों में से तीन पर विजय हासिल हुई है। एबीवीपी के विजय की इस गूंज में कॉक्रोच जनता पार्टी ही नहीं, बल्कि सीजेपी के बनाए माहौल में अपने लिए राह तलाश रहे राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' भी 'खामोश' साबित हुई।
शनिवार शाम आए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव परिणाम में एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद पर विजय हासिल की। जिसमें यश डबास ने 24,576 वोट पाकर अध्यक्ष पद हासिल किया। रिया छाबड़ी ने 21,650 वोट पाकर सचिव और संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी के लक्ष्य राज सिंह ने 16,615 वोट हासिल करते हुए विजय पताका लहराया। निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने चौंकाते हुए उपाध्यक्ष पद हासिल किया। दिलचस्प बात यह है कि दीपांशु एनएसयूआई से टिकट चाहते थे, टिकट न मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और उपाध्यक्ष पद पर धमाकेदार जीत हासिल की।
एबीवीपी को ऐसे समय यह जीत मिली है जब राहुल गांधी अलग-अलग शहरों में युवा संपर्क अभियान के तहत 'छात्रों की गूंज' नाम से कार्यक्रम करके सुर्खियां बटोर रहे हैं। भाजपा की तरफ से राहुल के इस कार्यक्रम को 'झूठ की गूंज' कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है। भाजपा के इस हमले को आज इस बात से भी बल मिल रहा है क्योंकि कांग्रेस के समर्थन वाले छात्र संगठन एनएसयूआई को इन चुनावों को एक भी सीट हासिल नहीं हुई, जबकि छात्रसंघ चुनावों में युवाओं की ही भागीदारी होती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में देश भर से छात्र पढ़ने आते हैं। ऐसे में एनएसयूआई की हार, राहुल की युवाओं पर केंद्रित कार्यक्रम को बेअसर साबित कर रही है।
भाजपा की तरफ से अमित शाह, किरेन रिजिजू और रेखा गुप्ता जैसे बड़े नेताओं ने एबीवीपी के विजेताओं की बधाई दी। इन परिणामों के बाद इंदौर में भी राहुल गांधी ने 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित किया और यहां तक कह दिया कि स्टूडेंट्स को भविष्य नहीं दिख रहा। राहुल के इस बयान को दिल्ली विवि चुनावों में एनएसयूआई को सभी सीटों पर मिले हार की निराशा से जोड़कर देखा जा रहा है।
राहुल गांधी से भी ज्यादा सोचनीय बयान सीजेपी के सौरव दास का है, जिसमें उन्होंने एबीवीपी या भाजपा का नाम लिए बिना दिल्ली विवि छात्रसंघ चुनाव परिणाम-2026 के बारे में कहा कि छात्रों का बहुमत मौजूदा सत्ता के खिलाफ है, लेकिन विपक्ष के बंटे होने का फायदा सत्ता पक्ष यानी भाजपा को मिल रहा है। सवाल उठता है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में जहां सैकड़ों राजनीतिक पार्टियां और उनमें से कई पार्टियों से जुडे छात्र संगठन सक्रिय हैं, जहां एक दल-दूसरे दल (खास तौर से इंडिया गठबंधन के विभिन्न दल) के नेता को अपना नेता मानने को तैयार नहीं, वहां वोट कैसे ना बंटे? इंडिया गठबंधन के तमाम दलों ने 2024 के चुनावों में राहुल गांधी को अपना नेता (प्रधानमंत्री पद का साझा उम्मीदवार) नहीं माना, बिहार चुनावों में तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कहने में कांग्रेस ने आनाकानी की, बंगाल चुनावों में कांग्रेस ने ममता बनर्जी के खिलाफ चुना लड़ा- वहां वोट कैसे ना बंटे?
एबीवीपी की जीत पर सौरव दास का कमेंट जल्दबाजी में और एक सीमित दायरे में किया गया कमेंट है, जिसमें उन्होंने विजयी उम्मीदवारों के लिए कहा कि उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उन्हें छात्रों के बहुमत का समर्थन नहीं मिला।
सौरव दास को अगर वोटों का बंटवारा रोकना है तो उन्हें इधर-उधर की बात छोड़कर स्पष्ट शब्दों में द्विदलीय प्रणाली की मांग करनी पड़ेगी, जो कि भारत जैसे विविधता भरे देश में कभी स्वीकार्य नहीं होगा।
ऐसे में सौरव दास को कौन समझाए कि चुनावों में जीत-हार का बहुदलीय चुनाव वाला फॉर्मूला, जिसमें वोटों का बंटवारा विभिन्न मुद्दों पर हो ही जाता है, वही हिंदुस्तान में मान्य है। चाहें विपक्ष के वोट बंटे या सत्ता पक्ष के, यहां चुनावों में सबसे ज्यादा मत पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी माना जाता है। यहां तक कि विजयी उम्मीदवार से भी अधिक वोट 'नोटा' को मिलने की स्थिति में भी चुनाव कैंसिल नहीं होता। पढ़े लिखे, युवा वोटरों के मत से मिली जीत को खुले दिल से स्वीकार न करना और जीते हुए उम्मीदवारों को नसीहत देना अपरिपक्वता और 'येन केन प्रकरेण' अपने पक्ष को सत्ता में काबिज करने की मंशा को प्रकट करता है। आज राजनीति में हारकर भी हार न स्वीकार करना, अगर-मगर करके, इधर-उधर की बातों से अपने पक्ष में नैरेटिव बिल्डिंग करना चतुर नेताओं की आदत बन गई है। यह स्पष्ट रुप में 'हकीकत से मुहं चुराने जैसा' है। ऐसा करने वालों को लगता है कि जनता इनके नैरेटिव बिल्डिंग में आ जाएगी, लेकिन ये उनकी गलतफहमी है, क्योंकि पब्लिक सब जानती है।


