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जहाँ खड़ी पाई नहीं लगती...

कभी-कभी अकारण ही कुछ लिखने के लिए मन बेचैन होने लगता है। मन में क्या चल रहा होता है, पता नहीं। बस लगता है कि उसे कहीं बाहर निकालना है....

Achintya Mishra
Achintya Mishra
29 September 2026, 2:36 pm• 7 min read

अचिन्त्य मिश्र युवा कवि, लेखक एवं शोधार्थी हैं। उनकी कविताएँ, वैचारिक लेख एवं साहित्यिक आलेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तथा अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं। वे गतिविधि : आधुनिक विचार मंच के संयोजक हैं और समकालीन हिंदी साहित्य एवं वैचारिक विमर्श में सक्रिय हैं। वर्तमान में वे दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत हैं।

जहाँ खड़ी पाई नहीं लगती...

किसी रूप में लिखने की आदत रही है, इसलिए घर, परिवार, समाज और दोस्तों के बीच बच जाता हूँ; वरना बदला हुआ रुख कोई जल्दी बर्दाश्त नहीं करता। बुरा भी लग सकता है। और उन्हें बुरा कैसे न लगे—बुरा उन्हीं से तो लगता है, जिनसे लगाव होता है। इसलिए जब-जब मन बेचैन होता है, मैं कुछ कहने-बोलने से बचना चाहता हूँ।

मन में बहुत-सी बातें आती रहती हैं। कभी-कभी ओवरथिंकिंग का भी शिकार हो जाता हूँ। ऐसी बातें यदि किसी से साझा करूँ तो जरूरी नहीं कि उनका अर्थ वही निकले, जो मेरे भीतर है। यह भी एक अवस्था होती है—जब खराब मन या विचार करता हुआ मन सक्रिय हो जाता है। मन है, कहीं भी जा सकता है। इसके बारे में किसी से कहना अपने लिए पागल होने की उपाधि अर्जित करना भी हो सकता है। शुक्र है कि ईश्वर ने भाषा दी है, जिससे स्वयं लिखकर अपने आपसे बात की जा सकती है।

अमूमन ऐसा लगता है कि शांत स्वभाव का आदमी कम बोलता है, लेकिन शायद उसके भीतर अपने ही साथ ढेर सारे विमर्श चल रहे होते हैं। उसका मौन बाहर की चुप्पी भर नहीं होता; वह भीतर चल रही बातचीत का परिणाम भी हो सकता है।

जीवन जैसा भी बना हुआ है, उसमें समाज और धर्म की बड़ी भूमिका है। अंततः इसी समाज में रहना होता है, इसलिए इससे भागा भी नहीं जा सकता। सवाल उठता है—भागकर जाएँ तो कहाँ? हम कहीं जाकर अपने को बदलना चाहें भी तो क्या बदल पाएँगे? स्थान बदल सकता है, मनुष्य वही रहता है। यही उसका स्वभाव है। स्वभाव से बहुत दूर जाना संभव है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। बहुत देर तक कोई अपने मूल स्वभाव के विरुद्ध नहीं चल सकता। स्वभाव प्रभावित हो सकता है, उसका रूप बदल सकता है, लेकिन मूल में वह आसानी से नहीं बदलता।

इंसान को माफ करने का अधिकार प्राप्त है, जैसे कानून को सजा देने का अधिकार है। माफ करना कोई गुनाह या कायरता नहीं, बल्कि कानून और दंड के विपरीत एक ऐसी मानवीय अवस्था है, जो भीतर प्रसन्नता पैदा करती है। बदला लेने का भी एक स्वभाव होता है और जैसे ही मनुष्य बदला ले लेता है, वह अपने भीतर किसी तरह की संतुष्टि अनुभव करता है। यहाँ स्वभाव के अंतर को देखा जा सकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि यह स्वभाव कितना अपना है और कितना किसी दूसरे से प्रभावित? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे हम अपना स्वभाव समझ रहे हैं, वह लंबे समय से पड़े किसी प्रभाव का परिणाम हो?

जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव आते हैं। मुझे लगता है कि जो आदमी अपने मूल स्वभाव में जीता है, वह कठिन से कठिन समय भी काट लेता है। मनुष्य का जीवन विमर्शों से घिरा हुआ है। यहाँ विचार करते-करते जीवन निकल जाता है और कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकलता। निकले भी कैसे, जब इन विमर्शों का निर्माता स्वयं मनुष्य है? अच्छा-बुरा, सच्चा-झूठा, प्रेम-घृणा—इन सबके लिए हमने अर्थ और सीमाएँ बनाई हैं। मूल में तो जीवन है और जीवन में प्रेम।

प्रेम की भी कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। साथ रहना ही प्रेम नहीं है। प्रेम किसी भी परिभाषा में पूरी तरह समा नहीं सकता। अहंकार की परिभाषा हो सकती है, प्रेम की नहीं। प्रेम की आँखें देखने या घूरने की नहीं होतीं; वह तो मात्र होती है। वह जैसे जीवन के भीतर वह नाभि है, जहाँ से जीवन का संचार होता है।

विचारों का कोई अंत नहीं होता। अंततः सारे विचार मनुष्य के मानस-पटल पर या तो स्वीकार करने योग्य ठहरते हैं या मनुष्य उनका विरोध करता है। अधिकतर विमर्श, जब किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचते, तो उनका अंत ईश्वर पर जाकर रुक जाता है। जीवन का क्या रूप है, उसका मूल क्या है और क्या कुछ मनुष्य द्वारा निर्मित है—इसका उत्तर आज तक किसी ने अंतिम रूप से नहीं दिया। दिया भी तो अपने विचार के भीतर से। आखिर इन सारे विमर्शों के केंद्र में मनुष्य स्वयं है।

शायद इसलिए जीवन जीने की कला सीख लेना चाहिए। जो उत्तम लगे, उसे करना चाहिए। ध्यान इतना रहे कि हमारे स्वभाव पर किसी दूसरे का प्रभाव कम-से-कम पड़े, ताकि भीतर के बीज को खिलने का अवसर मिले और मनुष्य किसी और के लिए नहीं, अपने लिए कोई मार्ग खोज सके। मार्ग इसलिए कि चित्त भीतर के संघर्ष का लगातार साक्षी होता है। यही संघर्ष जब किसी रूप में बाहर आता है तो क्रांति तक में बदल सकता है। क्रांति आखिर है क्या? विचारक के भीतर लंबे समय से चल रहे विमर्श का एक ऐसा विस्फोट, जो बाहर आकर किसी रूप में दिखाई देने लगता है।

सिर्फ समस्याओं पर सराहना देना या संवेदना प्रकट करना भी एक सामान्य और स्वस्थ चित्त की पहचान है। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि मनुष्य जितना व्यापक भीतर है, उतना शायद बाहर नहीं होता—चाहे वह बाहर कितना ही कुछ क्यों न कमा ले। भीतर से ही बाहर का अनुभव होने लगे तो शायद वही स्थिति धीरे-धीरे प्रौढ़ता में बदलती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मनुष्य के मनोविकारों की चर्चा करते हुए बालक के प्रारंभिक रुदन को उसकी मूल आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति के रूप में देखा है। आगे चलकर उसके भीतर प्रतिकार और प्रतिक्रिया के भाव विकसित होते हैं और इन्हीं से अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं। भीतर के संसार में जीने वाला मनुष्य विचारों से भरा होता है। यह बात भी अपने आप में एक विचार है। वह कहाँ तक सही है, इसका अनुमान न केवल विचार करने वाला लगा सकता है, न केवल उसे समझने वाला। विचार अंततः भाषा में ही उतर सकता है; भाषा से आगे उसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

असल में जीवन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वह जटिलता की ओर बढ़ता जाता है। जैसे-जैसे समझने वाला जीवन को समझता है, उसी क्षण उसे यह भी पता चलता है कि अभी बहुत कुछ शेष है और जो कुछ सोचा-समझा गया है, वह कहीं न कहीं अधूरा है। शायद यही कारण है कि बड़े-बड़े विचारक और चिंतक भी जीवन को किसी एक परिभाषा में बाँध नहीं सके।

जैसे माँ अपने नवजात बच्चे को पालते हुए उसकी नींद, भूख और दिनभर की गतिविधियों के क्रम को समझने लगती है, वैसे ही वह दिनचर्या को पकड़ना चाहती है; लेकिन जैसे ही उसे लगता है कि उसने बच्चे की लय को समझ लिया है, बच्चे की दिनचर्या बदल जाती है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। किसी बात का निष्कर्ष हो या स्वयं जीवन—एक बिंदु पर पहुँचते-पहुँचते, जहाँ मनुष्य खड़ी पाई लगाकर एक क्षण साँस लेना चाहता है, वहीं से जमीन खिसक जाती है।

शायद मनुष्यता की यह सतत दौड़ भी इसी ओर संकेत करती है कि यहाँ ठहरकर खड़ी पाई लगाने का कोई स्थायी स्थान नहीं है। जीवन सतत परिवर्तनशील और चिंतनशील विषय है। शायद इसीलिए इसकी न कोई निश्चित उम्र है, न कोई अंतिम सीमा।

इस परिवर्तनशील समय में लोग इस बात को समझने लगे हैं कि जिस तरह जटिलताएँ बढ़ रही हैं, वे गहराई में किस ओर इशारा कर रही हैं, यह किसी के लिए पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं। हमारे सामने एक बड़ा प्रश्न है—क्या वह सभ्यता, जिसमें मनुष्य जीवन के किसी निष्कर्ष की तलाश कर रहा है, स्वयं असफल हो रही है? या फिर जीवन के विषय में किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुँच जाना ही मनुष्य की मूल असफलता है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि बढ़ती हुई जटिलताओं के कारण मनुष्य की चेतना की धार ही धीरे-धीरे घिस रही है? यह स्वयं एक विचारणीय प्रश्न है। आज का उत्तर-आधुनिक समय इस बात की छूट देता है कि खुलकर देखो, परखो और प्रयोग करो; लेकिन परंपरा सावधान करती है कि प्रयोग जोखिम भरा हो सकता है और जरूरी नहीं कि हर प्रयोग सफल ही हो। परंपरा और आधुनिकता का यह संघर्ष शायद कभी समाप्त होने वाला नहीं।

यहीं कला की आवश्यकता सामने आती है। कला ही जीवन को देखने की दृष्टि देती है और उसे समग्रता में देखने का विवेक भी। साहित्य कला का ही एक रूप है, जो जीवन के बाहर और भीतर चल रहे संघर्षों के बीच एक प्रकार की स्थिरता पैदा करता है। संघर्ष हो, लेकिन उसका परिणाम केवल ध्वंस न हो; बेचैनी हो, लेकिन वह विनाश में न बदले—इससे मनुष्य की रक्षा साहित्य और कला करते हैं।